सोनिया ने बुलायी मोदी के खिलाफ विपक्ष की बैठक, केजरीवाल ने इस वजह से कर दिया आने से मना

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इन दिनों बीजेपी का चाहे कई राज्यों से राज छिना है लेकिन अब भी देश की सबसे बड़ी पार्टी, केंद्र में सत्ता और दर्जनों राज्यों में सरकारे होने के कारण बीजेपी पॉवरफुल तो है और इसको कमजोर करने के लिए कांग्रेस पार्टी कोशिश कर रही है लेकिन राजनीतिक हितो के चलते हुए कई पार्टियाँ और नेता मोदी के खिलाफ चुनाव लड़ते नजर तो आते है लेकिन वो सोनिया के खेमे में आने से कतराते है. इनमे से एक है अरविन्द केजरीवाल जो अब हाल ही में फिर से दिल्ली के मुख्यमंत्री बने है.

मोदी ही कर सकते है दिल्ली की जरूरते पूरी, टकराव से केजरीवाल को होती है राजनीतिक क्षति
अरविन्द केजरीवाल ने सोनिया गांधी की बैठक से किनारा कर लिया जो उन्होंने मोदी के खिलाफ आयोजित की थी इसके पीछे मोटे मोटे दो कारण है. पहला तो ये कि दिल्ली एक पूर्ण राज्य नही है और इस कारण से केजरीवाल को कोई बड़े लेवल का काम करना है तो मोदी सरकार की मंजूरी किसी न किसी तरह से चाहिए ही होती है. अगर एलजी के सिग्नेचर नही मिलेंगे तो काम अटका ही रहेगा.

दूसरा सबसे बड़ा कारण है केजरीवाल के अपने सपोर्टर जो आम आदमी पार्टी की भिडंत मोदी से नही चाहते है. पिछले चुनावों के अनुमान बताते है कि जिन लोगो ने केजरीवाल को तीन तीन बार मुख्यमंत्री बनाया उन्ही लोगो ने जब केंद्र के चुनावों की बात आयी तो दिल्ली के सातो सांसद भाजपा के बना दिये. यानी जब ऐसी कंडीशन बनती है जब दिल्ली के लोगो को डायरेक्ट केजरीवाल और मोदी में से किसी एक को चुनना होता है तो वो मोदी को ही चुनते है. अरविन्द को वो बस एक लोकल लीडर के तौर पर अच्छा मानते है और यही कारण है कि अब केजरीवाल ने खुदकी छवि को मोदी के खिलाफ जाने से रोक रखा है.

अब कांग्रेस के पास केजरीवाल को देने के लिए कुछ भी है तो नही तो ऐसे विपक्ष से एकजुटता दिखाकर के केजरीवाल को कोई फायदा नही बल्कि नुकसान ही है जिसके चलते अरविन्द ने सोनिया गांधी की विपक्ष की एकजुटता वाली बैठक को अंगूठा दिखाते हुए अलविदा कह दिया.