दूसरी जाति में शादी करनी चाहिये या नही? सुनिये खुद संघ प्रमुख की ज़ुबानी

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राष्ट्रीय स्वयमसेवक संघ का नाम जहाँ पर भी आता है वहाँ पर नाम आता है हिन्दुओ का और हिन्दू नाम आते ही पहली सामाजिक व्यवस्था सामने आती है जातीय व्यवस्था. हिन्दू धर्म जो दुनिया के महज इस एक देश पर सिमटा हुआ है लेकिन इसकी आबादी 100 करोड़ से भी ज्यादा है और इन सभी को 3000 हजार जातियों और लगभग 25 हजार उपजातियो में बाँट रखा है. कोई अपर कहा जाता है तो कोई लोअर. शहरो में तो काफी हद तक भेदभाव मिट चुका है मगर कई देहाती हिस्से है जहाँ पर हिन्दू धर्म का ही हिस्सा रहे कुछ लोगो कुँए से पानी भरने की अनुमति नही है क्यूंकि वो अछूत है.

ये तो एक मेजर समस्या है लेकिन नयी दिक्कत पैदा हुई हिया जनरेशन गैप की क्योंकि अब सोशल मीडिया है टेक्नोलॉजी है, संविधान है और विज्ञान है जिसके चलते अभी की जनरेशन को प्यार बड़ी जल्दी हो जाता है और कई बार जाति से बाहर भी हो जाता है. इसके बाद परिवार से लेकर समाज तक जातीय व्यवस्था का हवाला देते है. कई बार उन्हें समाज निकाला मिलता है तो कई बार जान तक ले ली जाती है जिसके मामले हरियाणा में अधिक आते है. अब आते है संघ की सोच पर.

मोहन भागवत का मानना, सामजिक समरसता बढाते है अंतरजातीय विवाह
मोहन भागवत कहते है हमारे देश में फिलहाल जातीय व्यवस्था नही बल्कि अव्यवस्था फैली हुई है. कभी व्यवस्था रही होगी लेकिन अब हालात ऐसे नही है.जातीय समरसता को कायम करने के लिये अंतर्जातीय विवाह होने जरूरी है. मोहन भागवत ने तो ये तक कह दिया कि अगर आप पूरे देश भर में सर्वे कराओगे तो सबसे ज्यादा हमारे स्वयंसेवक ही है जिन्होंने दूसरी जाति में शादी की है.

संघ खुद भी करवाता है प्रेमी जोड़ो की शादी
राजस्थान के कई बड़े शहरो जैसे जोधपुर और जयपुर आदि में संघ शुरू से ही सामूहिक विवाह करवाता है जिनका रिकॉर्ड एक साथ 2 हजार शादियों तक का होता है. इसमें वो प्रेमी जोड़ो की शादी भी करवाते है जो दूसरी जाति हो, वो सवर्णों की शादी भी करवाते है और दलितों की भी शादी होती है. इसके पीछे का मकसद सिर्फ सभी को एक मंच पर लाना है.

एक कुआ, एक शमशान और एक मंदिर है संघ का लक्ष्य
संघ का मानना है कि दलित अपनी सेना बनाकर या सवर्ण अपने संगठन बनाकर सिर्फ आपस में लड़ सकते है, वो मजबूत नही हो सकते है. सन 2015 में संघ ने एक प्रोग्राम शुरू किया था जिसे एक कुआ, एक शमशान और एक मंदिर कहा गया. इसमें संघ के कार्यकर्ता गाँव के लोगो को समझाने का प्रयास करते कि कोई भी अछूत नही है, कोई भी ऊँचा या नीचा नही है. हालांकि ये कामयाब नही हो पाया क्योंकि ये समस्या सैकड़ो सालो से है जिसे कुछ लोग यूँही मिटा नही सकते.