क्या था श्यामा प्रसाद मुखर्जी का सपना जिसके लिये उन्होंने कश्मीर में आज के दिन बलिदान दिया?

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श्यामा प्रसाद मुखर्जी यानि भारतीय जनता पार्टी के सबसे बड़े आइडल. वो नेता जिनके अधिकतर सिद्धांतो पर चलकर अटल से लेकर मोदी की सरकार बनी लेकिन उनका अंत, देश के इतने बड़े व्यक्ति का अंत बड़े ही रहस्यों से भरा हुआ. जिसने अपने राष्ट्रवादी स्वप्न के लिये अपने प्राण तक त्याग दिये. हम बात कर रहे है भारत की पहली सरकार में पहले गैर कांग्रेसी वित्त मंत्री रहे और वैचारिक लड़ाई में अपने आपको झोंक देने वाले श्यामा प्रसाद मुखर्जी की जिनके पीछे बीजेपी अक्सर कहती है, जहाँ बलिदान हुए मुखर्जी वो कश्मीर हमारा है.

प्रतिष्ठित परिवार में जन्मे अतिबुद्धिमान बालक थे
कलकत्ता के बड़े शिक्षा विद के घर में जन्मे थे श्यामा प्रसाद मुखर्जी उनके पिता को लोग सर आशुतोष मुखर्जी कहकर के बुलाते थे. मेट्रिक पास कर श्यामा प्रसाद ने बीए की डिग्री हासिल की और फिर वकालत की पढ़ाई की. वो इंग्लैंड भी गये और वहाँ भी उन्हें काफी सम्मान मिले. वकालत भी की और तो और कलकत्ता विश्वविद्यालय के कुलपति भी बने.

राजनीति में आये लेकिन नेहरु विरोधी  बनकर
1939 में श्यामा प्रसाद मुखर्जी एक्टिव पॉलिटिक्स में कूद गये और उन्होंने खुलकर नेहरु गांधी की उन नीतियो का विरोध किया जो हिन्दुओ को हाथिये पर धकेल रही थी. 1947 को आजादी के बाद बनी सरकार में वो पहले वित्त मंत्री बने थे और गैर कांग्रेसी थे, लेकिन भारत सरकार की नीतियाँ उन्हें पसंद नही आयी तो त्यागपात्र देकर विपक्ष में बैठ गये.

एक देश एक ध्वज के लिये कश्मीर की तरफ की थी कूच
नेहरु की गलत नीतियों के कारण कश्मीर में अलग झंडा और अलग नियम कायदे जैसी चीजो के खिलाफ मुखर्जी डटकर खड़े हो गये. उन्होंने इसका खुलकर न सिर्फ विरोध किया बल्कि 1953 में बगैर परमिट के ही कश्मीर की तरफ अखंड भारत की सोच लेकर यात्रा करने निकल पड़े. इससे पूरा देश उनके पीछे खड़ा हो गया. हालांकि उन्हें बादमें नजरबंद कर लिया गया और रहस्यमयी परिस्थितियों में उनका देहांत हो गया.

मुखर्जी के सिद्धांत बने बीजेपी के मार्गदर्शक
श्यामा प्रसाद मुखर्जी के सिद्धांत एक राष्ट्रएक ध्वज, कश्मीर हमारा है और तुष्टिकरण नही होने देंगे जैसी नीतियों के आधार पर ही जनसंघ खड़ा हुआ, बीजेपी बनी और अटल मोदी की सरकारे बनी. आज भी वो मुखर्जी के 370 हटाने जैसे सिद्धांतो पर कार्यरत है.