अगर 23 मई को बीजेपी की सरकार नही बनी तो होंगे देश को ये 4 बड़े नुकसान

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देश के चुनाव अंतिम चरण में पहुँच चुके है. हर किसी की धड़कन तेज है और सभी को इन्तजार है तो बस सिर्फ और सिर्फ चुनाव के परिणाम आने का. देश में वोटर और पार्टियां कई धड़ो में बंट गये है. एक तरफ बीजेपी है तो एक तरफ महागठबंधन है, तीसरी तरफ कांग्रेस है तो एक छोर पर फेडरल फ्रंट है. सबकी अपनी अपनी मनमानी है लेकिन देश का सबसे अधिक घाटा उसमे है अगर बीजेपी सत्ता से हट जाये. अगर फ़िलहाल की मीडिया रिपोर्ट्स की माने तो बीजेपी सरकार के सत्ता से हटने पर ये मुख्य दुष्परिणाम हो सकते है.

शेयर मार्केट में भारी गिरावट 

फ़िलहाल कई सारे अर्थशास्त्रियों और मीडिया रिपोर्ट्स ने दावा किया है कि अगर मोदी सरकार सत्ता से जाती है तो निफ्टी 15 प्रतिशत तक गिर सकता है और इससे भयानक क्राइसिस शेयर बाजार में हो नही सकता. इसके पीछे वजह भी है कि बाजार वर्तमान सरकार के साथ तालमेल बिठाकर के चलता है और सरकार बदलते ही सब कुछ भंग हो जाता है जिसका खामियाजा शेयर बाजार को उठाना पड़ता है क्योंकि कई व्यापारिक नीतियाँ बदलने का भय लगने लगता हैं.

फॉरेन पॉलिसीज और रिप्रेजेंटेशन 

देश के प्रमुख नेता के साथ में एक वर्ल्ड आर्डर बनता है जो दुनिया में उसकी साख निर्धारित करता है. फ़िलहाल नरेंद्र मोदी के करीबी नेता शिंजो आबे, बेंजामिन न्येतायाहू, डोनाल्ड ट्रम्प, पुतिन और एंजेला मार्केल है जो दुनिया में न सिर्फ भारत को वर्तमान सरकार की पूर्ण बहुमत सरकार के चलते इज्जत देते है बल्कि साथ ही साथ में इंटरनेशनल फोरम में भी सहायता करते है.

निवेश में कमी

अगर एनडीए की सरकार नही बन पाती है तो जाहिर तौर पर किसी की भी पूर्ण बहुमत वाली सरकार बन पाना संभव ही नही है. जब किसी देश में एक पूर्ण बहुमत वाली सरकार नही होती है तो उसकी व्यापारिक नीतियों में अलग अलग पार्टियों के अलग अलग मत होते है जो घरेलू बाजार में अस्थिरता को जन्म देते हैं और इस कारण से विदेशी कम्पनियाँ उस देश में निवेश करने से घबराती हैं.

प्रभावहीन प्रधानमंत्री

इस देश ने कई बार छोटे छोटे दलों के समर्थन से बनी सरकार देखी है जिनमे प्रधानमंत्री का अपने पद पर कोई भी कण्ट्रोल नही होता है क्योंकि उन फैसलों को लेने का कार्य पार्टी के साथ जुड़े समर्थक दल करते है. अगर ऐसा होता है तो प्रधानमंत्री पद 5 वर्ष के लिए केवल नाम का रह जायेगा और आपसी मनमुटाव होने पर सरकार गिर भी सकती है जो दुबारा कई सैकड़ो करोड़ के चुनावी खर्च की आहट होगी.